अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असली सच

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असली सच

पश्चिम एशिया में बारूद की गंध एक बार फिर गहरी हो गई है। हालिया रिपोर्ट्स से साफ है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य हमलों के एक नए दौर की तैयारी कर रहा है। सुरक्षा विश्लेषक और खुफिया एजेंसियां इसे सिर्फ एक चेतावनी नहीं बल्कि एक गंभीर सैन्य रणनीति के रूप में देख रही हैं। पिछले कुछ हफ्तों में पेंटागन के भीतर हलचलें तेज हुई हैं। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत और घातक लड़ाकू विमानों की तैनाती इस बात का सीधा सबूत है कि बाइडेन प्रशासन अब किसी भी मोर्चे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है।

यह तनाव अचानक पैदा नहीं हुआ। लाल सागर में हूतियों के हमले, सीरिया और इराक में अमेरिकी ठिकानों पर रॉकेटबारी और ईरान का लगातार बढ़ता यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम इसकी मुख्य वजहें हैं। अमेरिका को लगता है कि अगर उसने अब कड़ा रुख नहीं अपनाया, तो पूरे मध्य पूर्व में उसकी पकड़ ढीली हो जाएगी। लेकिन क्या सिर्फ मिसाइल हमलों से ईरान को झुकाया जा सकता है? इतिहास बताता है कि यह इतना आसान नहीं है।

व्हाइट हाउस की नई रणनीति और सैन्य मोर्चेबंदी

वाशिंगटन के नीति नियंताओं ने अब रणनीति बदल दी है। पहले जहां केवल प्रतिबंधों और कूटनीति पर जोर था, वहीं अब सैन्य विकल्प टेबल पर सबसे ऊपर दिखाई दे रहे हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस नए दौर की तैयारी का उद्देश्य ईरान की अग्रिम सैन्य क्षमताओं और उसकी प्रॉक्सी ताकतों को पंगु बनाना है।

पेंटागन ने हाल ही में खाड़ी क्षेत्र में बी-52 बमवर्षक विमानों और अतिरिक्त वायु रक्षा प्रणालियों की तैनाती को मंजूरी दी है। यह केवल एक शक्ति प्रदर्शन नहीं है। यह सीधे तौर पर ईरान के परमाणु ठिकानों और मिसाइल डिपो को निशाना बनाने की रिहर्सल है। अमेरिकी जनरल इस बार किसी भी चूक से बचना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि ईरान की जवाबी कार्रवाई भी उतनी ही घातक हो सकती है।

खुफिया इनपुट और हमलों के संभावित ठिकाने

अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों से संकेत मिलते हैं कि अगर हमले शुरू होते हैं, तो उनका दायरा काफी बड़ा होगा। अमेरिकी सेना केवल ईरान के भीतर ही नहीं, बल्कि उसके सहयोगियों पर भी एक साथ वार करने की योजना बना रही है।

  • ईरान के भीतर मौजूद अंडरग्राउंड मिसाइल साइलो और ड्रोन निर्माण इकाइयां पहला निशाना बनेंगी।
  • यमन में मौजूद हूती विद्रोहियों के कमांड सेंटर और हथियारों के गोदामों को तबाह किया जाएगा ताकि समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित हो सके।
  • सीरिया और इराक में सक्रिय ईरान समर्थक मिलिशिया के ठिकानों पर हवाई हमले तेज किए जाएंगे।

रणनीतिकार मानते हैं कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को पहाड़ों के नीचे इतनी गहराई में छिपा रखा है कि उन्हें सामान्य बमों से नष्ट करना नामुमकिन है। इसके लिए अमेरिका को अपने सबसे भारी बंकर-बस्टर बमों (GOPB) का इस्तेमाल करना पड़ेगा।

वैश्विक तेल बाजार और भारत पर इसका सीधा असर

जब भी मध्य पूर्व में गोलियां चलती हैं, उसकी गूंज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में सुनाई देती है। ईरान और अमेरिका का यह टकराव केवल दो देशों के बीच का मामला नहीं है। यह दुनिया की लाइफलाइन कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़ा है।

दुनिया का लगभग बीस फीसदी तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। अगर ईरान इस रास्ते को ब्लॉक करता है, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ऐसी स्थिति में कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकता है।

भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। हम अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करते हैं। तेल महंगा होने का सीधा मतलब है कि भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे, जिससे माल ढुलाई महंगी होगी और आम आदमी की जेब पर महंगाई की दोहरी मार पड़ेगी। इसके अलावा, खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी एक बड़ा सिरदर्द बन जाएगी।

कूटनीति के बंद होते रास्ते और आगे का विकल्प

अब सवाल यह उठता है कि क्या युद्ध को टाला जा सकता है? सच तो यह है कि कूटनीति के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं। 2015 का परमाणु समझौता (JCPOA) अब इतिहास की बात बन चुका है। ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा है और अमेरिका अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

इस तनाव को कम करने के लिए अब केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव ही एक रास्ता बचा है। यूरोपीय देश और कुछ हद तक चीन भी नहीं चाहते कि खाड़ी में एक और बड़ा युद्ध भड़के। लेकिन अगर ईरान ने अपनी आक्रामक नीतियां नहीं बदलीं, तो अमेरिका के पास सैन्य कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

इस गंभीर स्थिति पर नजर रखने वाले भारतीय निवेशकों और नीति निर्माताओं को अभी से अपनी रणनीति तैयार रखनी होगी। बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की पूरी आशंका है, इसलिए पोर्टफोलियो में विविधता लाना और सुरक्षित संपत्तियों जैसे सोने में निवेश बढ़ाना एक समझदारी भरा कदम हो सकता है। सरकार को भी तेल के वैकल्पिक स्रोतों और रणनीतिक तेल भंडारों को मजबूत करने पर तुरंत काम शुरू कर देना चाहिए ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

YS

Yuki Scott

Yuki Scott is passionate about using journalism as a tool for positive change, focusing on stories that matter to communities and society.