डोनल्ड ट्रंप के दावे में कितना दम है और क्यों ईरान सच में अमेरिका से डील चाहता है

डोनल्ड ट्रंप के दावे में कितना दम है और क्यों ईरान सच में अमेरिका से डील चाहता है

ईरान और अमेरिका की दुश्मनी दशकों पुरानी है। यह कोई गुप्त बात नहीं है। लेकिन जब डोनल्ड ट्रंप मंच पर आते हैं, तो इस दुश्मनी की कहानी में एक नया मोड़ आ जाता है। ट्रंप ने हाल ही में एक बड़ा दावा किया कि ईरान अमेरिका के साथ समझौता करने के लिए बेताब है। वह डील करने के लिए छटपटा रहा है। पहली नजर में यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान लग सकता है। चुनावी रैलियों में ऐसे दावे आम होते हैं। लेकिन अगर आप मध्य पूर्व की आर्थिक हालत और ईरान की अंदरूनी स्थिति को बारीकी से देखें, तो इस दावे के पीछे छिपे सच को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ईरान सच में गहरे संकट में है। उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसकी कमर तोड़ दी है। उसकी मुद्रा रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिर चुकी है। देश में महंगाई आसमान छू रही है और आम जनता सड़कों पर है। ऐसे में ईरान के पास अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अमेरिका से बातचीत करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। ट्रंप के इस बयान का सीधा मतलब यही है कि ईरान अब दबाव झेलने की स्थिति में नहीं है। वह किसी भी तरह इन प्रतिबंधों से राहत चाहता है।

ट्रंप की सख्त नीतियां और ईरान की मजबूरी

ट्रंप प्रशासन की नीतियां हमेशा से ईरान के प्रति बेहद सख्त रही हैं। अपने पिछले कार्यकाल में ट्रंप ने साल 2015 में हुए परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को बाहर कर लिया था। उन्होंने इसे इतिहास का सबसे खराब समझौता बताया था। इसके बाद उन्होंने ईरान पर "अधिकतम दबाव" की रणनीति अपनाई। ईरान के तेल निर्यात पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई, जो उसकी कमाई का मुख्य जरिया था।

ईरान ने लंबे समय तक यह दिखाने की कोशिश की कि उसे इन प्रतिबंधों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह चीन और रूस के साथ मिलकर एक नया गुट बनाने की कोशिश करता रहा। लेकिन सच्चाई यह है कि चीनी मदद भी ईरान की घरेलू अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से ढहने से नहीं बचा सकी। ईरान के आम लोग बुनियादी चीजों के लिए तरस रहे हैं। जब किसी देश के भीतर भुखमरी और असंतोष बढ़ने लगता है, तो सरकारें ज्यादा दिनों तक अपनी जिद पर अड़ी नहीं रह सकतीं। ईरान के नए नेतृत्व के बयानों में भी अब वह पुरानी तल्खी नजर नहीं आती, बल्कि वे बातचीत के रास्ते तलाश रहे हैं।

क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक स्टंट है

कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक ट्रंप के इस दावे को सिर्फ अपनी पीठ थपथपाने का जरिया मानते हैं। उनका कहना है कि ट्रंप अपनी छवि एक कुशल संकटमोचक के रूप में पेश करना चाहते हैं। वे दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि जो काम मौजूदा अमेरिकी प्रशासन नहीं कर पाया, वह उन्होंने केवल अपने कड़े रुख से कर दिखाया।

लेकिन यह पूरी तरह से गलत भी नहीं है। ईरान के विदेश मंत्रालय के कुछ हालिया बयानों पर गौर करें। उन्होंने साफ कहा है कि अगर अमेरिका अपने प्रतिबंध हटाता है, तो वे परमाणु कार्यक्रम पर दोबारा बात करने को तैयार हैं। यह बयान साफ तौर पर ईरान की बेताबी को दर्शाता है। वे खुलकर नहीं कह सकते कि वे हार मान रहे हैं, इसलिए वे इसे कूटनीतिक भाषा में लपेटकर पेश कर रहे हैं।

  • ईरान का कच्चा तेल का निर्यात कानूनी रूप से लगभग ठप है।
  • देश में मुद्रास्फीति की दर 40 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है।
  • बेरोजगारी दर युवाओं में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है।

इन आंकड़ों को देखकर कोई भी समझ सकता है कि ईरान की स्थिति कितनी नाजुक है। वह सिर्फ समय काटने की कोशिश कर रहा है।

पर्दे के पीछे की कूटनीति

ऐसा नहीं है कि दोनों देशों के बीच बातचीत पूरी तरह से बंद है। ओमान और कतर जैसे देश लंबे समय से दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे हैं। कैदियों की अदला-बदली और फ्रीज किए गए फंड को रिलीज करने जैसे मुद्दों पर पर्दे के पीछे बातचीत होती रही है। इसका मतलब है कि ईरान बातचीत की मेज पर आने के बहाने ढूंढ रहा है।

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने भी कुछ समय पहले संकेत दिए थे कि अगर देश के हित में हो, तो "दुश्मन" से बात करने में कोई बुराई नहीं है। यह ईरान की नीति में एक बड़ा बदलाव था। जो देश कभी अमेरिका को "महान शैतान" कहता था, वह अब उसके साथ टेबल पर बैठने का रास्ता साफ कर रहा है। ट्रंप इसी कमजोरी को भांप चुके हैं और इसी का फायदा उठा रहे हैं।

आगे का रास्ता और भारत पर इसका असर

अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई नई डील होती है, तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। भारत के लिए ईरान हमेशा से कच्चे तेल का एक बड़ा और सस्ता स्रोत रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरान से तेल खरीदना बंद करना पड़ा था। इसके अलावा भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में भी शामिल है, जो मध्य एशिया तक पहुंचने का उसका रणनीतिक रास्ता है।

अगर ट्रंप के दावों के मुताबिक कोई समझौता होता है और प्रतिबंध हटते हैं, तो भारत को इसका सबसे ज्यादा फायदा होगा। भारत फिर से ईरान से सस्ता तेल आयात कर सकेगा, जिससे घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम हो सकती हैं। साथ ही चाबहार प्रोजेक्ट में भी तेजी आएगी।

इस पूरी स्थिति को समझने के लिए आपको केवल बयानों पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत पर नजर रखनी होगी। ईरान की बेताबी कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, यह उसकी मजबूरी है। आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति किस करवट बैठेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि अमेरिका अपनी शर्तों को कितना कड़ा रखता है और ईरान अपनी संप्रभुता को बचाते हुए कितना झुकने को तैयार होता है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इस खेल पर लगातार नजर बनाए रखना जरूरी है क्योंकि इसके फैसले सीधे आपकी जेब और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं।

LC

Lin Cole

With a passion for uncovering the truth, Lin Cole has spent years reporting on complex issues across business, technology, and global affairs.