ईरान ने किया अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हमला और बदल गई मध्य पूर्व की सुरक्षा रणनीति

ईरान ने किया अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हमला और बदल गई मध्य पूर्व की सुरक्षा रणनीति

मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदें एक बार फिर ताश के पत्तों की तरह बिखर गई हैं। हाल ही में खबर आई कि ईरान ने किया अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हमला, 5 सैनिक हुए घायल। यह महज एक आम सीमाई झड़प नहीं है। यह घटना दर्शाती है कि इलाके में तनाव किस हद तक बढ़ चुका है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने भी इस हमले की पुष्टि की है। इस सीधे हमले ने वाशिंगटन और तेहरान के बीच चल रहे छद्म युद्ध (प्रोक्सी वॉर) को एक खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

लोग अक्सर पूछते हैं कि आखिर ईरान बार-बार ऐसे कदम क्यों उठाता है? क्या वह सीधे महाशक्ति से टकराना चाहता है? जवाब इतना सीधा नहीं है। इसके पीछे सालों की भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय वर्चस्व की जंग है। इस हमले के बाद अब सवाल सिर्फ घायल सैनिकों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या यह घटना एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की चिंगारी बनेगी?

ईरान ने किया अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हमला और इसके पीछे की रणनीतिक टाइमिंग

जब हम कहते हैं कि ईरान ने किया अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हमला, 5 सैनिक हुए घायल, तो हमें इसकी टाइमिंग को समझना होगा। यह हमला अचानक बिना किसी योजना के नहीं हुआ। सीरिया और इराक की सीमाओं के पास मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों की पुरानी रणनीति रही है। लेकिन इस बार का हमला सीधा और घातक था। ड्रोन और कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया।

पेंटागन के सूत्रों के अनुसार, घायल हुए पांच अमेरिकी सैनिकों में से दो की हालत गंभीर है। उन्हें इलाज के लिए जर्मनी के लैंडस्टुहल क्षेत्रीय चिकित्सा केंद्र में एयरलिफ्ट किया गया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने साफ किया है कि इन हमलों का जवाब तय समय और जगह पर दिया जाएगा।

बड़ा सवाल यह है कि ईरान अभी ही क्यों आक्रामक हो रहा है? दरअसल, तेहरान पर आर्थिक प्रतिबंधों का भारी दबाव है। वह पश्चिमी देशों को दिखाना चाहता है कि अगर उसकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई गई, तो वह पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।

हमलों में इस्तेमाल किए गए हथियार और सुरक्षा में चूक

इस कार्रवाई में जिन ड्रोनों का इस्तेमाल हुआ, वे रडार की नजर से बचकर निकलने में माहिर थे। अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम 'पैट्रियट' इस हमले को पूरी तरह रोकने में नाकाम रहा। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि मिलिशिया ने 'सwarm ड्रोन' तकनीक का इस्तेमाल किया। इसमें एक साथ कई ड्रोन भेजे जाते हैं ताकि डिफेंस सिस्टम भ्रमित हो जाए।

यह अमेरिकी सैन्य तैयारियों पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी अगर अग्रिम मोर्चे पर मौजूद सैनिक सुरक्षित नहीं हैं, तो रणनीति में गंभीर कमियां हैं।

अमेरिकी प्रतिक्रिया और राष्ट्रपति का कड़ा रुख

व्हाइट हाउस की तरफ से जारी बयान बेहद सख्त था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के साथ आपातकालीन बैठक की। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका अपने सैनिकों पर होने वाले हर वार का बदला लेगा। लेकिन उनके सामने एक बड़ी दुविधा है।

  • अगर अमेरिका सीधे ईरान पर हमला करता है, तो कच्चा तेल $150 प्रति बैरल पार कर जाएगा।
  • अगर वह चुप रहता है, तो घरेलू राजनीति में उसे कमजोर माना जाएगा। चुनाव नजदीक हैं और कोई भी राष्ट्रपति कमजोर नहीं दिखना चाहता।

इतिहास गवाह है कि जब भी अमेरिका ने आक्रामक रुख अपनाया है, मध्य पूर्व की तेल सप्लाई लाइन बाधित हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को ईरान कभी भी बंद कर सकता है। दुनिया का एक-तिहाई समुद्री तेल यहीं से गुजरता है।

मध्य पूर्व के देशों की चुप्पी और उनका डर

इस हमले के बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों ने बेहद सधे हुए बयान दिए हैं। वे नहीं चाहते कि वे इस लड़ाई के बीच में पिसें। कुछ साल पहले तक सऊदी अरब सीधे तौर पर अमेरिका के हर फैसले के साथ खड़ा रहता था। आज स्थिति बदल चुकी है। चीन की मध्यस्थता के बाद ईरान और सऊदी के रिश्ते थोड़े सुधरे हैं। इसलिए रियाद इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।

सऊदी अरब का मुख्य ध्यान अपने 'विजन 2030' पर है। वे अपनी अर्थव्यवस्था को तेल से हटाकर पर्यटन और तकनीक पर ले जाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें शांति चाहिए, युद्ध नहीं।

क्या वाकई दुनिया एक और बड़े युद्ध की तरफ बढ़ रही है

ईरान के इस कदम को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज (IISS) की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास इस समय मध्य पूर्व में सबसे बड़ा मिसाइल शस्त्रागार है। उसकी मिसाइलें न केवल अमेरिकी ठिकानों बल्कि इजरायल को भी निशाना बनाने की क्षमता रखती हैं।

हकीकत यह है कि कोई भी पक्ष पूर्ण युद्ध नहीं चाहता। न तो अमेरिका और न ही ईरान। ईरान जानता है कि सीधे युद्ध में वह अमेरिकी सैन्य ताकत का मुकाबला नहीं कर पाएगा। वहीं अमेरिका भी वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसी गलतियों को दोहराना नहीं चाहता। इसलिए, हमें आने वाले दिनों में और अधिक 'सटीक और सीमित' जवाबी कार्रवाइयां देखने को मिलेंगी। अमेरिका ईरान समर्थित समूहों के ठिकानों पर बमबारी करेगा, और ईरान इसकी निंदा करेगा। खेल इसी तरह चलता रहेगा।

पेंटागन के पूर्व रणनीतिकार मार्क किममित का मानना है कि इस तरह के हमले अमेरिकी सैनिकों के मनोबल को तोड़ने के लिए किए जाते हैं। जब तक अमेरिका सीरिया और इराक में अपनी मौजूदगी कम नहीं करता, ये हमले रुकने वाले नहीं हैं।

इस तनाव के बीच भारत पर क्या असर पड़ेगा

भारत के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है। हमारे हित दोनों तरफ से जुड़े हैं। अमेरिका हमारा रणनीतिक साझेदार है, तो ईरान के साथ हमारे ऐतिहासिक संबंध हैं। चाबहार बंदरगाह में भारत ने भारी निवेश किया है ताकि मध्य एशिया तक पहुंच बनाई जा सके।

अगर यह तनाव बढ़ता है, तो चाबहार परियोजना ठंडे बस्ते में जा सकती है। इसके अलावा, भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा मतलब है भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों का बढ़ना। इससे महंगाई बढ़ेगी जो आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालेगी। भारत सरकार को अपनी कूटनीति को बेहद सक्रिय रखना होगा ताकि हमारे आर्थिक हित सुरक्षित रहें।

अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर सुरक्षा व्यवस्था को तुरंत अपग्रेड करने की जरूरत है। ड्रोन रोधी तकनीकों (Anti-Drone Systems) को और अधिक चुस्त-दुरुस्त बनाना होगा। खुफिया तंत्र को मजबूत किए बिना इन हमलों को रोकना नामुमकिन है। पेंटागन को अपनी फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेसेज की सुरक्षा नीति की समीक्षा करनी होगी। मिलिशिया समूहों के वित्तीय स्रोतों पर कड़े प्रतिबंध लगाने होंगे ताकि उनकी हथियार खरीदने की क्षमता को चोट पहुंचाई जा सके। दुनिया इस समय एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है, जहां एक छोटी सी चूक भी बड़ी तबाही का कारण बन सकती है।

LC

Lin Cole

With a passion for uncovering the truth, Lin Cole has spent years reporting on complex issues across business, technology, and global affairs.